Author: के.एस. सैनी
जम्मू-कश्मीर के सीमावर्ती और दूरदराज़ गांव देश की सुरक्षा, संवेदनशीलता और संघर्ष की जीवित तस्वीर हैं। यहां तैनात सुरक्षाबल जहां हर मौसम और हर परिस्थिति में डटे रहते हैं, वहीं प्रशासनिक ढांचा अक्सर कमजोर दिखाई देता है।
सवाल उठता है—क्या वजह है कि सरकारी कर्मचारी इन इलाकों में पोस्टिंग से बचना चाहते हैं? और यदि ऐसा है, तो इसका खामियाजा कौन भुगत रहा है? जवाब स्पष्ट है—वह आम नागरिक, जो विकास और बुनियादी सेवाओं के लिए सरकार की ओर उम्मीद से देखता है।
डर, दूरी और दिक्कतों का त्रिकोण
सीमावर्ती क्षेत्रों में नौकरी केवल एक पद नहीं, बल्कि जोखिम से भरा दायित्व है। गोलाबारी, घुसपैठ या अचानक तनाव की आशंका यहां की रोज़मर्रा की सच्चाई है। ऐसे माहौल में परिवार से दूर रहकर काम करना हर किसी के लिए आसान नहीं। लेकिन समस्या केवल सुरक्षा तक सीमित नहीं है।
इन गांवों में अक्सर सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा और संचार जैसी बुनियादी सुविधाएं अधूरी हैं। कई जगहों पर इंटरनेट और मोबाइल नेटवर्क तक स्थिर नहीं, जिससे प्रशासनिक काम भी प्रभावित होता है। सरकारी आवास का अभाव, बच्चों की पढ़ाई की चिंता और चिकित्सा सुविधाओं की कमी कर्मचारियों को मानसिक रूप से असुरक्षित बना देती है। नतीजतन, पोस्टिंग आदेश आते ही “प्रभाव” और “सिफारिश” का खेल शुरू हो जाता है।
विकास का रुकना, विश्वास का टूटना
जब कर्मचारी नहीं पहुंचते, तो योजनाएं फाइलों में कैद हो जाती हैं। स्कूलों में शिक्षक नहीं, अस्पतालों में डॉक्टर नहीं, और दफ्तरों में अधिकारी नहीं—यह स्थिति सीमावर्ती गांवों के लोगों को दोहरी उपेक्षा का एहसास कराती है। एक तरफ सीमा पार से खतरा, दूसरी तरफ अपने ही तंत्र की अनुपस्थिति। इससे सरकार के प्रति भरोसा कमजोर होता है, जो किसी भी संवेदनशील क्षेत्र के लिए खतरनाक संकेत है।
समाधान केवल आदेश नहीं, व्यवस्था है
सरकार के पास विकल्प हैं, लेकिन उन्हें लागू करने की इच्छाशक्ति चाहिए। सबसे पहले, सीमावर्ती पोस्टिंग को “सज़ा” नहीं, “सम्मान” बनाना होगा। जोखिम भत्ता, विशेष वेतन वृद्धि और प्रमोशन में प्राथमिकता जैसे ठोस प्रोत्साहन कर्मचारियों का नजरिया बदल सकते हैं।
सुरक्षित और आधुनिक सरकारी आवास, बेहतर स्कूल और अस्पताल, तथा परिवार के लिए बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध कराना अनिवार्य है। साथ ही, निश्चित कार्यकाल की नीति कर्मचारियों को भरोसा दे सकती है कि उन्हें अनिश्चित काल तक कठिन परिस्थितियों में नहीं रहना पड़ेगा।
डिजिटल कनेक्टिविटी और सड़क संपर्क बेहतर करना भी उतना ही जरूरी है। आज के दौर में इंटरनेट केवल सुविधा नहीं, बल्कि प्रशासन और शिक्षा की जीवनरेखा है।
सीमाओं की मजबूती, लोगों के भरोसे से
सीमावर्ती गांव केवल भौगोलिक रेखाएं नहीं, बल्कि देश की पहली पंक्ति हैं। यदि वहां रहने वाले लोग खुद को उपेक्षित महसूस करेंगे, तो सुरक्षा और विकास दोनों प्रभावित होंगे। सरकारी कर्मचारियों की मौजूदगी वहां शासन का चेहरा है—यदि वही गायब हो जाए, तो राज्य की उपस्थिति भी कमजोर दिखने लगती है।
समय आ गया है कि नीति-निर्माता इस मुद्दे को केवल प्रशासनिक समस्या नहीं, बल्कि राष्ट्रीय प्राथमिकता के रूप में देखें। क्योंकि सीमाएं केवल सैनिकों से सुरक्षित नहीं होतीं, बल्कि वहां बसे नागरिकों के विश्वास से मजबूत बनती हैं—और यह विश्वास तभी बनेगा, जब सरकार उनके दरवाजे तक पहुंचेगी।
