Written by : K.S. Saini
जम्मू-कश्मीर में हजारों की संख्या में कार्यरत अस्थायी कर्मचारी आज भी अपने भविष्य को लेकर गहरी अनिश्चितता में जी रहे हैं। सरकारी विभागों, नगर निकायों, शिक्षा, स्वास्थ्य, बिजली, जल शक्ति और अन्य क्षेत्रों में वर्षों से सेवाएं देने के बावजूद इन कर्मचारियों को न तो स्थायी दर्जा मिला है और न ही सम्मानजनक वेतन। महंगाई के इस दौर में उनका जीवनयापन दिन-ब-दिन कठिन होता जा रहा है।
सबसे बड़ी समस्या कम वेतन और अनियमित भुगतान की है। कई विभागों में अस्थायी कर्मचारियों को महीनों तक वेतन नहीं मिलता, जिससे घर का खर्च चलाना मुश्किल हो जाता है। किराया, बच्चों की पढ़ाई, दवाइयां और रोजमर्रा की जरूरतें पूरी करना उनके लिए चुनौती बन गया है। कुछ कर्मचारियों को तो न्यूनतम मजदूरी से भी कम भुगतान किया जाता है, जो उनके श्रम के साथ न्याय नहीं है।
अस्थायी कर्मचारियों को सामाजिक सुरक्षा का भी अभाव है। स्थायी कर्मचारियों की तरह उन्हें पेंशन, मेडिकल सुविधा, बीमा या अन्य भत्तों का लाभ नहीं मिलता। दुर्घटना या बीमारी की स्थिति में उनका परिवार आर्थिक संकट में घिर जाता है। वर्षों से सेवा देने के बाद भी नौकरी की कोई गारंटी नहीं होने से उनके मन में असुरक्षा की भावना बनी रहती है।
इन कर्मचारियों का कहना है कि वे स्थायी कर्मचारियों के बराबर काम करते हैं, लेकिन अधिकार और सुविधाएं उन्हें नहीं मिलतीं। कई बार उन्होंने अपनी मांगों को लेकर प्रदर्शन और हड़ताल भी की, परंतु ठोस समाधान अभी तक नहीं निकल पाया। सरकार द्वारा समय-समय पर आश्वासन दिए जाते हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर बदलाव नजर नहीं आता।
विशेषज्ञों का मानना है कि प्रशासन को इस मुद्दे पर गंभीरता से ध्यान देना चाहिए। लंबे समय से सेवाएं दे रहे कर्मचारियों के नियमितीकरण, न्यूनतम वेतन सुनिश्चित करने और सामाजिक सुरक्षा प्रदान करने के लिए ठोस नीति बनाना आवश्यक है। इससे न केवल कर्मचारियों का जीवन स्तर सुधरेगा बल्कि सरकारी कामकाज की गुणवत्ता भी बेहतर होगी।
समाधान नहीं निकलता, तब तक उनका संघर्ष जारी रहेगा। जम्मू-कश्मीर के विकास में योगदान देने वाले इन कर्मियों के लिए सम्मानजनक जीवन सुनिश्चित करना सरकार और समाज दोनों की जिम्मेदारी है।
